मैं बस अपने भीतर लौट रहा हूँ।
आजकल मैं महसूस कर रहा हूँ कि मैं आहिस्ता-आहिस्ता स्वयं के लिए उपलब्ध होता जा रहा हूँ। ये दूरी किसी नाराज़गी से नहीं जन्मी, न ही किसी अहंकार से। ये बस भीतर की एक थकान है गहरी, शांत, और लगभग अदृश्य। जैसे कोई नदी अपने ही तल में उतरती चली जाए, बिना शोर किए। कभी मैं लोगों के बीच रहकर भी अपने होने को महसूस करता था। बातचीतों में अर्थ खोजता था, संबंधों में सुकून। लेकिन अब वही आवाजें मुझे थका देती हैं। शब्द बोझ लगते हैं। अपेक्षाएँ काँधे पर रखे अदृश्य पत्थरों की तरह भारी हो जाती हैं। कोई पूछ ले "कैसे हो?" तो मन में उत्तर होता है, पर होंठों तक नहीं आता। क्योंकि सच बहुत लंबा है, और लोग अक्सर छोटा जवाब चाहते हैं। एकांत का कमरा मुझे पुकारता है। चार दीवारें, एक खिड़की, हल्की रौशनी, और भीतर की आवाज़ें। वहाँ कोई अभिनय नहीं है। कोई भूमिका नहीं निभानी पड़ती, न मित्र, न पुत्र, न प्रेमी, न मार्गदर्शक, बस मैं अपने सबसे असुरक्षित, सबसे सच्चे रूप में। उस कमरे में बंद रहना भागना नहीं है; वह अपने भीतर उतरने की एक धीमी प्रक्रिया है। जैसे कोई व्यक्ति भीड़ से हटकर आईने के सामने खड़ा हो और पहली बार बिना झ...